वहीं खरगापुर राज परिवार के सदस्य और भाजपा नेता हरदेव सिंह कहते हैं कि
जनता में अपने परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उनके परिवार का
सामूहिक निर्णय है कि वो शराब को हाथ नहीं लगाते.
वो बताते हैं, "सालों पुरानी ये परंपरा आज की युवा पीढ़ी भी कायम रखे हुए है. हम नहीं चाहते कि लोग हमें पुराने ज़माने के राजाओं की भावना से देखें. ये अलग बात है कि राज परिवार का सदस्य होने से आज भी जनता में एक अलग किस्म का सम्मान मिलता है. लेकिन इस भाव को बनाए रखने के लिए हमें अपने व्यवहार को काफ़ी हद तक मर्यादित रखना पड़ता है."
ऐसे ही एक राजपरिवार से जुड़े एक युवा अपने व्यवहार को जनता के सामने बेहतर तरीके से पेश करने के लिए पर्सनैलिटी डेवलपमेंट की बाकायदा ट्रेनिंग ले चुके हैं.
नाम न बताने की शर्त पर वे कहते हैं कि पहनावे में सिर्फ कुर्ता-पायज़ामा पहनना, लोगों से हाथ मिलाकर उनसे गले लगने तक की कला, ये सब बदलाव उन्हें याद रखने पड़ते हैं.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ छोटे राजघराने या ज़मींदार ही खुद को बदल रहे हों, बल्कि बड़े नेता भी जनता के मन में हो रहे बदलाव को भांप रहे हैं.
बीते कुछ साल से कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया किसी भी कार्यक्रम में अपने नाम के आगे श्रीमंत शब्द लगाए जाने से बचते हैं.
दिग्विजय सिंह के विधायक बेटे जयवर्धन सिंह और अर्जुन सिंह के विधायक बेटे अजय सिंह भी आम तौर पर उनके करीबियों द्वारा कुंवर साहब के संबोधन को सार्वजानिक तौर पर दूर ही रखते हैं.
मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया का मानना है कि राजघरानों और जमीदारों द्वारा जनता से जुड़ाव की कोशिश एक बाहरी दिखावा भर है
उन्होंने कहा "वो खुद को एलीट क्लास या राजा-महाराजा ही समझते हैं. लेकिन उन्हें इस बात का अहसास तो हो ही गया है कि सिर्फ राजा बनकर चुनाव नहीं जीते जा सकते सो खुद में बदलाव का स्वांग रच रहे हैं."
इनके ख़िलाफ़ जगह-जगह बैठक और धरनों का सिलसिला भी तेज़ हुआ है. सड़कों पर जुलूस भी निकाले जाते रहे हैं.
ये संगठन इन दिनों झारखंड में धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने लोगों को अनूसचित जनजाति के आरक्षण का लाभ नहीं दिए जाने की मांग भी मजबूती से उठाने में जुटे हैं. बीजेपी के नेता भी इस मांग को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं.
क़रीब 185 घरों वाले गढ़खटंगा आप जाएं, तो दूसरे गांवों की तरह यहां के लोग भी रोजमर्रा की ज़िंदगी जीते नज़र आएंगे.
कुछ साल पहले गांव के सामने से चौड़ा रिंग रोड गुजरा है. इसलिए यहां शहरीकरण का असर भी दिखने लगा है.चर्च को सरना भवन बनाए जाने के मामले में हालात-हकीकत टटोलना चाहें तो मर्दों से ज़्यादा महिलाएं मुखर होकर सामने आएंगी.
महिलाओं की अगुवाई करती रहीं सुशांति देवी कहती हैं कि यह कदम उठाना निहायत ज़रूरी था. उन्होंने कहा, "गढ़खटंगा के रास्ते उन्होंने पूरे राज्य के सरना आदिवासियों के बीच एक संदेश देने का काम किया है."
सुशांति देवी चर्च की गतिविधियों और स्थानीय पास्टर (प्रचारक) की भूमिका पर भी सवाल खड़े करती हैं. इसी गांव की सरिता उरांव, सुमन लकड़ा, पार्वती खोया, सोमानी पहनाइन भी सुशांति देवी की बातों पर हामी भरती हैं.
वो बताते हैं, "सालों पुरानी ये परंपरा आज की युवा पीढ़ी भी कायम रखे हुए है. हम नहीं चाहते कि लोग हमें पुराने ज़माने के राजाओं की भावना से देखें. ये अलग बात है कि राज परिवार का सदस्य होने से आज भी जनता में एक अलग किस्म का सम्मान मिलता है. लेकिन इस भाव को बनाए रखने के लिए हमें अपने व्यवहार को काफ़ी हद तक मर्यादित रखना पड़ता है."
ऐसे ही एक राजपरिवार से जुड़े एक युवा अपने व्यवहार को जनता के सामने बेहतर तरीके से पेश करने के लिए पर्सनैलिटी डेवलपमेंट की बाकायदा ट्रेनिंग ले चुके हैं.
नाम न बताने की शर्त पर वे कहते हैं कि पहनावे में सिर्फ कुर्ता-पायज़ामा पहनना, लोगों से हाथ मिलाकर उनसे गले लगने तक की कला, ये सब बदलाव उन्हें याद रखने पड़ते हैं.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ छोटे राजघराने या ज़मींदार ही खुद को बदल रहे हों, बल्कि बड़े नेता भी जनता के मन में हो रहे बदलाव को भांप रहे हैं.
बीते कुछ साल से कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया किसी भी कार्यक्रम में अपने नाम के आगे श्रीमंत शब्द लगाए जाने से बचते हैं.
दिग्विजय सिंह के विधायक बेटे जयवर्धन सिंह और अर्जुन सिंह के विधायक बेटे अजय सिंह भी आम तौर पर उनके करीबियों द्वारा कुंवर साहब के संबोधन को सार्वजानिक तौर पर दूर ही रखते हैं.
मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया का मानना है कि राजघरानों और जमीदारों द्वारा जनता से जुड़ाव की कोशिश एक बाहरी दिखावा भर है
उन्होंने कहा "वो खुद को एलीट क्लास या राजा-महाराजा ही समझते हैं. लेकिन उन्हें इस बात का अहसास तो हो ही गया है कि सिर्फ राजा बनकर चुनाव नहीं जीते जा सकते सो खुद में बदलाव का स्वांग रच रहे हैं."
झारखंड की राजधानी रांची से क़रीब 25
किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल गढ़खटंगा गांव सुर्खियों में है. इस गांव के
लोगों ने आदिवासियों की ज़मीन पर बने चर्च को सरना भवन बना दिया है. साथ ही चर्च के ऊपर लगे क्रॉस को तोड़कर सरना झंडा लगा दिया है.
चर्च के
ख़िलाफ़ आदिवासियों की इस कार्रवाई ने एक नई बहस छेड़ दी है. कई मौकों पर
सरना आदिवासी (प्रकृति पूजक आदिवासी) और इनके संगठन झारखंड में ईसाइयों के
धर्म प्रचारकों तथा चर्च की गतिविधियों को लेकर सवाल खड़े करते रहे हैं. इनके ख़िलाफ़ जगह-जगह बैठक और धरनों का सिलसिला भी तेज़ हुआ है. सड़कों पर जुलूस भी निकाले जाते रहे हैं.
ये संगठन इन दिनों झारखंड में धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने लोगों को अनूसचित जनजाति के आरक्षण का लाभ नहीं दिए जाने की मांग भी मजबूती से उठाने में जुटे हैं. बीजेपी के नेता भी इस मांग को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं.
क़रीब 185 घरों वाले गढ़खटंगा आप जाएं, तो दूसरे गांवों की तरह यहां के लोग भी रोजमर्रा की ज़िंदगी जीते नज़र आएंगे.
कुछ साल पहले गांव के सामने से चौड़ा रिंग रोड गुजरा है. इसलिए यहां शहरीकरण का असर भी दिखने लगा है.चर्च को सरना भवन बनाए जाने के मामले में हालात-हकीकत टटोलना चाहें तो मर्दों से ज़्यादा महिलाएं मुखर होकर सामने आएंगी.
महिलाओं की अगुवाई करती रहीं सुशांति देवी कहती हैं कि यह कदम उठाना निहायत ज़रूरी था. उन्होंने कहा, "गढ़खटंगा के रास्ते उन्होंने पूरे राज्य के सरना आदिवासियों के बीच एक संदेश देने का काम किया है."
सुशांति देवी चर्च की गतिविधियों और स्थानीय पास्टर (प्रचारक) की भूमिका पर भी सवाल खड़े करती हैं. इसी गांव की सरिता उरांव, सुमन लकड़ा, पार्वती खोया, सोमानी पहनाइन भी सुशांति देवी की बातों पर हामी भरती हैं.
Comments
Post a Comment